दमा/अस्थमा : कारण, लक्षण और बचाव

दमा को ही अंग्रेजी में “अस्थमा” कहते हैं। यह एक यूनानी शब्द है, जिसका अर्थ होता है- “जल्दी-जल्दी व तेजी से सांस लेना” या “सांस लेने के लिए जोर लगाना” यह एक ऐसी बीमारी है, जिसमें आपके फेफड़ों के अंदर जानेवाले वायुमार्ग संकीर्ण हो जाते हैं और बलगम पैदा करते हैं। जब ऐसा होता है, तब सांस लेना मुश्किल हो जाता है। इसका रोगी सामान्य सांस के लिए भी लंबी-लंबी सांस लेता है। नाक से ली गई सांस कम पड़ती है, तो मुंह खोलकर सांस लेने लगता है। वास्तव में रोगी को सांस लेने की बजाय सांस बाहर निकालने में ज्यादा कठिनाई होती है। फलत: रोगी के फेफड़े में हवा भरने के कारण उसका फेफड़ा फुल जाता है।

एलर्जी, जुकाम के वाइरस, दवाइयां, धूल, रसायन, कसरत और भावात्मक संवेग आदि दमा के वेग/दौड़े को बढ़ाने का काम करते हैं। हम कह सकते हैं कि ये सब दमा के प्रेरक तत्व हैं। दमा के कारण खांसी, नाक बजना, छाती का कड़ा होना, रात और सुबह में सांस लेने में तकलीफ आदि जैसे लक्षण पैदा हो जाते हैं और व्यक्ति परेशान रहने लगता है। इसके रोगियों को रात के समय, खासकर सोते हुए अधिक कठिनाई महसूस होती है।

दमा के लक्षण

यह धीरे-धीरे भी उभरता है और अचानक भी भड़कता है। इसके एकाएक भड़कने से पहले खांसी का दौरा होता है, लेकिन जब यह धीरे-धीरे उभरता है, तो इसके आने से पहले आमतौर पर श्वसन प्रणाली में संक्रमण हो जाया करता है।

● सांस सामान्य से तेज हो जाती है।
● सांस लेने में कठिनाई होती है।
● दिल की धड़कन की रफ्तार बढ़ जाती है।
● रोगी घरघराहट या आवाज के साथ सांस लेता है।
● रोगी बेचैनी और थकावट महसूस करता है।
● खाँसी आ सकती है, जो रात में या बड़े सवेरे और गंभीर हो सकती है।
● सीने में जकड़न/कसावट महसूस हो सकती है।
● बहुत अधिक पसीना आ सकता है।
● छींक आ सकता है।
● उलटी भी हो सकती है।
● सिर भारी लग सकती है।
● गले में खुजली व दर्द का हो सकता है।
● शरीर के अंदर खिंचाव हो सकता है।
● अगर आपके डॉक्टर ने “पीक फ्लो मीटर” (Peak flow meter) के इस्तेमाल का निर्देश दिया हो, तो इसके रेटिंग/पाठ्यांक में गिरावट आ सकता है।

आपको दमे के और भी लक्षण हो सकते हैं, यदि ----

● आपको एलर्जी हो।
● आपके परिवार के किसी सदस्य को दमा हो।
● आप वायु-प्रदूषण के प्रति संवेदनशील हैं।
● आप धुएं से प्रभावित होते हो।
● आप तनावग्रस्त हैं।

दमा होने के कारण

● मौसम, खाद्य पदार्थ, दवाइयां व इत्र जैसी खुशबू से एलर्जी के कारण हो सकता है।
● रुई के बारीक रेशे, आटे की धूल, कागज की धूल, कुछ फूलों के पराग, पशुओं के बाल, फफूंद और कॉकरोज, दीमक जैसे कीड़े से एलर्जी के कारण हो सकता है।
● खाद्य पदार्थों जैसे गेहूं, आटा, दूध, चॉकलेट, बींस की फलियां, आलू, सूअर और गाय के मांस से एलर्जी के कारण हो सकता है।
● सिगरेट के धुएं, पेंट/रसोई की तीखी गंध, एस्पिरीन व अन्य दवाओं, खाद्य पदार्थों में सल्फाइट और कुछ विशेष रसायनों से एलर्जी के कारण हो सकता है।
● अनेक बार दमा एलर्जिक और गैर-एलर्जी वाली स्थितियों के मेल से भड़क जाता है। इसमें भावनात्मक दबाव, वायु-प्रदूषण, विभिन्न संक्रमण और आनुवंशिक कारणों को शामिल किया जाता है।
● मोटापे के कारण भी दमा हो सकता है।

अगर कोई शिशु तंबाकू के धुएं भरे माहौल में रहता है, तो उसे दमा हो सकता है। गर्भ के दौरान कोई महिला तंबाकू के धुएं के बीच रहती है, तो उसके बच्चे को दमा हो सकता है। एक अनुमान के मुताबिक, जब माता-पिता को “दमा” या “हे फीवर” (Hay Fever) होता है, तो ऐसे 75 से 100 प्रतिशत माता-पिता के बच्चों में भी दमा के होने की संभावना जतायी जाती है।

दमे के रोगी की देखभाल

नीचे लिखे कारकों के लिए अलग-अलग दवाईयां लेने की जरूरत होती है ---

● वायु मार्ग खोलने के लिए।
● एलर्जी वाले कारकों के प्रति आपका शरीर कम प्रतिक्रिया करे इसलिए।
● आपके वायु मार्ग की सूजन कम करने के लिए।
● मस्तिष्क में रक्त की संकुलता कम करने के लिए।

दमे के दौरे को कैसे रोकें ?

● दमे की दवा सदा अपने पास रखें। इसके लक्षण आपके शरीर से चलें जाएं, तब भी अपनी निर्धारित दवाइयां लेते रहिए।
● सिगरेट, पाइप और सिगार के धुंए से बचके रहिए।
● जिन खाद्य पदार्थों, दवाइयों या चीजों से आपको दमे के लक्षण होते हैं, उन से दूर रहें। ये आपके दमे के लिए प्रेरक (ट्रिगर्स) का काम करते हैं।
● जिन लोगों को जुकाम या फ्लू हो, उनसे मिलने का प्रयास न करें।
● जुकाम होने के पहले लक्षण के समय ही आराम कीजिए और खूब तरल पदार्थ पीजिए।
● सर्द मौसम में स्कार्फ या किसी अन्य वस्त्र का प्रयोग करते हुए सांस लीजिए।
● अपने फेफड़ों को मजबूत बनाने के लिए कसरत करें, लेकिन इसे करने से पहले अपने डॉक्टर से परामर्श कर लें।
● अपना तनाव कम करें।

दमे का प्राकृतिक उपचार कैसे करें ?

● शरीर के रोगी पदार्थों को बाहर निकालने के लिए समुचित आहार कार्यक्रम को अपनाएं।
● शरीर को मजबूत बनाने की कोशिश करें।
● योगासन और प्राणायाम का अभ्यास करना ताकि भोजन का उत्तम पाचन हो सके।
आपके फेफड़ों को बल मिले। उसमें लचीलापन आए। श्वास प्रणाली भी मजबूत हो।
● रोगी को एनीमा देकर उसकी आंतों की सफाई करना चाहिए।
● पेट पर गीली पट्टी रखने से बिना पचे हुए खाद्य पदार्थ सड़ नहीं पाते।
● पानी में भीगा कपड़ा पेट पर रखने से फेफड़ों की जकड़न कम होती है।
● रोगी को भाप-स्नान कराकर उसका पसीना बहाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त उसे गरम पानी में कूल्हों तक या पाँव डालकर बैठाया जा सकता है और धूप स्नान भी कराया जा सकता है। इससे त्वचा उत्तेजित होती है और रोगी को बल मिलता है। साथ-ही फेफड़ों की जकड़न भी दूर हो जाती है।
● रोगी को कुछ दिनों तक ताजे फलों के रस का सेवन करना चाहिए। इसके अलावा और कुछ नहीं। ताजा फलों के एक गिलास रस में उतना ही पानी मिलाकर दो-दो घंटे के बाद सुबह आठ बजे से शाम आठ बजे तक लेना चाहिए। कुछ दिनों बाद, जब आपको लगे कि आपकी सेहत में सुधार आ रहा है, तो आप अपने भोजन में ठोस पदार्थ को भी शामिल कर सकते हैं।
● अपने आहार में कार्बोहाइड्रेट, चिकनाई और प्रोटीन जैसे तेजाब बनाने वाले पदार्थ को शामिल न करें या इनका उपयोग बेहद सीमित मात्रा में करें। अधिक से अधिक ताजे फल, हरी सब्जियां और अंकुरित चने जैसे क्षारीय खाद्य पदार्थों का इस्तेमाल करें। यहीं आपके लिए सबसे अच्छा होगा।
● चावल, शक्कर, तिल और दही जैसे बलगम बनाने वाले पदार्थ और तले हुए व गरिष्ठ खाद्य पदार्थों का सेवन न करें।
● दमा के रोगी अपनी क्षमता से कम खाना लें और अपने भोजन को आराम से चबा-चबाकर खाएं।
● प्रतिदिन कम से कम आठ से दस गिलास पानी पीना चाहिए।
● भोजन के साथ पानी या किसी अन्य तरह के तरल पदार्थों को लेने से बचें।
● तेज मसाले, मिर्च, अचार, अत्यधिक चाय-कॉफी आदि के सेवन से परहेज करें।
● दमा, विशेषकर तेज दमे का दौरा, हाजमे को खराब करता है। अत: रोगी भोजन का सेवन दबाव में आकर न करे। जब तक दमे का दौरा दूर न हो जाए, तब तक रोगी को लगभग उपवास करना चाहिए। ऐसे मामले में रोगी हर दो घंटे के बाद एक प्याला गरम पानी पी सकता है। इस तरह के मौके पर रोगी को “एनीमा” लेना चाहिए क्योंकि इससे काफी लाभ मिलता है।

अपने चिकित्सक को फौरन बुलाएं यदि -----

● आपको खांसी है।
● आपकी सांस में घरघराहट है।
● आपको सांस लेने में तकलीफ हो रही है।
● आपको 101 डिग्री फारेनहाइट या 38 डिग्री सेल्सियस से अधिक बुखार हो।
● सीने में दर्द।
● आपके होंठ और नाखून सफेद/नीले हो जाय।
● आप का कफ/बलगम सफेद या पारदर्शी नहीं है। यह इतना गाढ़ा हो कि खांसी में नहीं निकल पा रहा हो।
● आपको अपनी दवाओं की बजह से इस प्रकार की समस्या हो रही हो- अस्थिरता, घबराहट, पेट में गड़बड़ी, मुंह का स्वाद बिगड़ना।
● अपनी सामान्य गतिविधियां या कसरत नहीं कर पा रहे हो।

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